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सिंघू सीमा पर किसान विरोध स्थल पर एक दलित व्यक्ति की निर्मम हत्या की घटना के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट……………..sc

आवेदन में कहा गया,
कहा गया कि घटनाएं न तो सामान्य हैं और न ही स्वीकार्य हैं। एक विरोध जो अपने आप में अवैध है और साथ ही उसमें मानवीय विरोधी कृत्य भी हो रहे हैं तो ऐसे विरोध प्रदर्शन को जारी नहीं रखा जा सकता। विरोधों प्रदर्शन में उक्त मानवीय विरोधी कृत्यों में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली, एक महिला के साथ बलात्कार सहित कई अप्रत्याशित और अस्वीकार्य चीजें देखी गई। इसके अलावा दशहरे पर लखबीर सिंह की हत्या का मामला भी है।"अधिवक्ता शशांक शेखर झा के माध्यम से दायर अर्जी में यह कहा गया कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जीवन के अधिकार का अतिक्रमण नहीं कर सकता और अगर इस तरह से विरोध जारी रखा गया तो बड़े पैमाने पर राष्ट्र को नुकसान होगा।
आवेदन में कहा गया,
"न केवल महामारी बल्कि विरोध के नाम पर हो रही मानव विरोधी गतिविधियों में एक महिला के साथ बलात्कार और एक दलित व्यक्ति की हत्या शामिल है। इन सबको घटनाओं को देखते हुए प्रदर्शन जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
आवेदन में आगे कहा गया
प्रदर्शनकारी न केवल अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, बल्कि भारत के लाखों लोगों की भी जान जोखिम में डाल रहे हैं। फिर इस तरह के लंबे आंदोलन की अनुमति चल रही महामारी के दौरान नहीं दी जा सकती है, क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक विरोध न केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का स्पष्ट उल्लंघन है, बल्कि अन्य लोगों के अधिकारों का भी उल्लंघन है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उक्त विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित हैं।
आवेदन में कहा गया कि मामले को 10 मई, 2021 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सर्वर में खराबी के कारण इसे 13 मई, 2021 के लिए स्थगित कर दिया गया। मगर उस दिन भी सुनवाई नहीं हो सकी, क्योंकि अदालत उस दिनांक पर सुनवाई के लिए नहीं बैठ सकी।
आवेदकों का कहना है कि मामले को तब 31 मई, 2021 को सूचीबद्ध किया गया, लेकिन बिना किसी सुनवाई के 12 जुलाई, 2021 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। फिर मामले को 12 जुलाई, 2021 को सूचीबद्ध नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट नोएडा की एक निवासी द्वारा दायर एक अन्य रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें किसानों के प्रदर्शन (मोनिका अग्रवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) के कारण दिल्ली-एनसीआर राजमार्ग पर नाकेबंदी के कारण होने वाली परेशानी का उल्लेख किया गया है।
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि सड़क की नाकेबंदी स्थायी नहीं हो सकती और मुद्दों का समाधान सार्वजनिक विरोध के बजाय न्यायिक मंच या संसदीय बहस के माध्यम से मांगा जाना चाहिए।
पीठ ने उस याचिका में किसान संगठनों के नेताओं को नोटिस जारी किया था और मामले की सुनवाई 20 अक्टूबर को तय की थी।
सिंघू लिंचिंग:-  सुप्रीम कोर्ट में किसान प्रदर्शनकारियों को हटाने की मांग करने वाली याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए आवेदन दायर


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