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न्यायमूर्ति R. नारायण पिशारदी की पीठ उस 16 साल की लड़की के मामले की सुनवाई कर रही थी, जो अपने पिता के बार-बार यौन उत्पीड़न ………………sc

  :- court ne  कहा रक्षक ही भक्षक बन गया। पिता अपनी बेटी का रक्षक और पनाह देने वाला होता है। अपनी ही बेटी का अपनी शरण में रहने के दौरान बलात्कार करने का आरोप, जंगली पक्षियों की शिकार से रक्षा करने वाले (गेमकीपर) का खुद शिकारी बनने और ट्रेजरी गार्ड के डाकू बनने से भी बदतर है।

court  इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी, पीड़ित-लड़की की विश्वसनीयता, age  के प्रमाण और पीड़ित की सहमति न होने के कानूनी सवालों पर भी विचार किया है।

पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि पीड़ित लड़की के पिता/आरोपी ने बार-बार उसका यौन उत्पीड़न किया और कई मौकों पर उसके साथ बलात्कार किया गया। लड़की pragnent  हुई और उसने एक लड़के को जन्म दिया। पुलिस को अपराध की सूचना देने पर, उप निरीक्षक ने आईपीसी की धारा 376 और 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया।
हालांकि कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 506 (ii) औरयौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम,
2012 posco act  धारा 6 के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। निचली अदालत ने आरोपी को सभी कथित अपराधों के लिए दोषी पाया और सजा सुनाई। इसके बाद आरोपी ने जेल से अपील दायर कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी।

निष्कर्ष

प्राथमिकी दर्ज करने में देरी :- 
प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी के सवाल पर, अदालत ने कहा कि उक्त देरी काफी स्वाभाविक थी,जो मामले की परिस्थितियों और पीड़ित-लड़की के बयान से न्यायसंगत प्रतीत होती है।

कोर्ट ने कहा कि कोई भी लड़की यह नहीं चाहेगी कि दुनिया को पता चले कि वह एक ऐसी व्यक्ति है जिसका उसके ही पिता ने यौन उत्पीड़न किया है।

court  आगे कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी, यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी के अपराध को कम करने वाला कारक नहीं है। अभियोजन पक्ष के मामले को खारिज करने और इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने के लिए इसे एक कर्मकांडीय सूत्र के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
इसके बजाय यह तथ्य केवल अदालत को यह देखने और विचार करने के लिए सतर्क करता है कि क्या देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण दिया गया है?

कोर्ट ने कहा कि अदालतें इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि यौन अपराधों के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने में देरी कई कारणों से हो सकती है, विशेष रूप से पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों की पुलिस के पास जाने और उस घटना के बारे में शिकायत करने की अनिच्छा होती है क्योंकि उनको पीड़िता की प्रतिष्ठा और उसके परिवार के सम्मान की चिंता होती है।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि जब अभियोजन पक्ष के गवाह से जिरह  / पूछताछ की जा रही थी, तो पुलिस को मामले की रिपोर्ट करने में देरी के संबंध में बचाव पक्ष ने उससे कोई सवाल नहीं पूछा था। इसलिए बाद में ऐसे बिंदु पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है। पॉलमेली बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने तय कानूनी प्रस्ताव को दोहराया और कहा कि यदि किसी विशेष बिंदु पर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने वाला सवाल अगर गवाह से जिरह के दौरान नहीं पूछा जाता है तो बाद में उक्त तथ्य/ मुद्दे की शुद्धता या वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

अभियोजन पक्ष के गवाह की विश्वसनीयता ::::::::

अभियोजन पक्ष के गवाह की विश्वसनीयता के सवाल पर, अदालत ने कहा कि इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि यह किसी और के कहने पर आरोपी के खिलाफ दर्ज किया गया एक झूठा मामला है।

कोर्ट ने माना कि कोई भी लड़की अपने सम्मान और गरिमा को दांव पर लगाने और अपने ही पिता के खिलाफ झूठी शिकायत करना पसंद नहीं करेगी, वो भी किसी अन्य व्यक्ति के कहने पर,जो उसके पिता के प्रति दुश्मनी रखता है।

इस तथ्य पर विचार करते हुए कि पीड़ित-लड़की ने किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संबंध रखने की बात स्वीकार की है, अदालत ने कहा कि यह तथ्य किसी भी तरह से उसकी गवाही की विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करता है। कोर्ट ने कहा कि,
"यहां तक कि अगर किसी मामले में यह दिखाया जाता है कि पीड़िता सहज सदाचार वाली लड़की है या बार-बार संभोग करने वाली लड़की है, तो भी यह आरोपी को बलात्कार के आरोप से मुक्त करने का कोई आधार नहीं हो सकता है। यहां तक ​​कि यह मानना कि पीड़िता पहले से संभोग की आदी है,यह एक निर्णायक प्रश्न नहीं है। इसके विपरीत, जिस प्रश्न पर निर्णय लेने की आवश्यकता है, वह यह है कि क्या आरोपी ने पीड़िता से बलात्कार किया था? यहां मुकदमा आरोपी पर चल रहा है, न कि पीड़िता पर।

कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध की शिकार होने के कारण लड़की को उसके साथी / आरोपी के बराबर नहीं रखा जा सकता है, इसलिए उसके सबूतों पर उतना ही संदेह नहीं किया जा सकता है। केवल उस मामले में जहां अदालत को पीड़िता के बयान को पूरी तरह स्वीकार करना मुश्किल लगता है, तो कोर्ट ऐसे प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य सबूत की तलाश कर सकती है जो उसकी गवाही को सही साबित करते हों।

उम्र और सहमति की दलील को साबित करने में विफलता पीड़िता की उम्र साबित करने में विफल रहने पर कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की उम्र साबित नहीं करने का नतीजा यह होता है कि आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत किसी भी अपराध का दोषी नहीं पाया जा सकता है। इस प्रकार, पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत उसे दी गई सजा को रद्द किया जाता है।

इसके बाद सहमति की दलील पर विचार किया गया,जिसे कोर्ट ने बहुत हल्का माना।

कोर्ट ने कहा कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है कि पीड़ित लड़की ने अपने पिता के साथ यौन संबंध बनाने के लिए सहमति दी थी। सहमति और आत्मसमर्पण/सबमिशन के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हर सहमति में सबमिशन शामिल है, लेकिन इसके विपरीत ऐसा नहीं होता है। अपरिहार्य मजबूरी के सामने बेबसी डर से घिरी हुई है,जिसे कानून में समझी जाने वाली सहमति नहीं माना जा सकता है। महत्व के ज्ञान और कृत्य के नैतिक प्रभाव के आधार पर बुद्धि का प्रयोग सहमति बनाने के लिए आवश्यक है।

अंत में, आईपीसी की धारा 506 (ii) के तहत दोषसिद्धि को रद्द करते हुए, कोर्ट ने कहा कि पीडब्ल्यू-1 ने अपनी गवाही में कहा कि उसके पिता ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी। हालांकि, जिरह के दौरान एक विशिष्ट प्रश्न के उत्तर में, उसने कहा कि उसके पिता ने उसे धमकी नहीं दी अदालत के समक्ष पीडब्ल्यू-1 द्वारा दिए गए अलग-अलग बयान को देखते हुए,इस बयान के आधार पर आरोपी को ipc की धारा 506 (ii) के तहत किसी अपराध के लिए दोषी करार नहीं दिया जा सकता है।



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