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बक्सवाहा जंगल में हीरा खदान की अनुमति मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल नई दिल्ली ने दिये निर्देश....?


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बक्सवाहा जंगल में हीरा खदान की अनुमति मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल नई दिल्ली ने दिये निर्देश…एस्सेल माइनिंग कंपनी शपथ पत्र के साथ 15 दिनों में स्थिति स्पष्ट करे।

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छतरपुर के बक्सवाहा जंगल में हीरा खदान वाले मामले मैं नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के पीजी नाथ पांडे ने एडवोकेट प्रभात यादव के माध्यम से एनजीटी में याचिका दायर की है जिसकी सुनवाई आज हुई जिसमें एनजीटी ने ठेका लेने वाली कंपनी एस्सेल माइनिंग कंपनी को 15 दिन के अंदर शपथ पत्र पर सारी स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया है.

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए एड. प्रभात यादव ने बताया की यह याचिका मुखतः पर्यावरण को बचाने के लिए दायर की गई है, कलेक्टर छतरपुर मे कॉम्पैसेंटरी फॉरेस्टेशन हेतु आदेश दिये है, लेकिन वह अपूर्ण है, अब वनभूमी को डायवर्ट करने की प्रक्रिया जारी है, पर्यावरण को क्षति पहुंचने की आशंका है। अत: एन्वायरमेंट क्लीयरेंस नहीं दिया जाये।

एस्सेल कम्पनी की ओर से सुनवाई के दौरान तर्क प्रस्तुत किया गया की पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा, इस हेतु आवश्यक अनुमतिया ली जा रही है। दोनों पक्षों की ओर से दलीले सुनने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एस्सेल माईविंग इंडस्ट्रेिल को निर्देश दिये कि वह अपना कथन  शपथ पत्र के साथ प्रस्तुत कर स्थिति स्पष्ट करे।

जानकारी के मुताबिक छतरपुर जिले के बक्सवाहा में सोगोरिया गांव के अंतर्गत 364 हेक्टेयर जंगल के इलाके में हीरा खदान के लिए एक निजी कंपनी को अनुमति दी गई है. याचिकाकर्ता डॉ. पीजी नाजपांडे के मुताबिक सरकार द्वारा 364 हेक्टेयर जमीन पर दी गई हीरा खदान की अनुमति कई मायनों में गलत है.

उल्लेखनीय है कि इस मामले में  डॉ. नाजपांडे ने बताया कि पूर्व में सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट और NGT द्वारा स्टेनेबल डेवलपमेंट के आदेशों की अनदेखी अनुमति में की गई है. NGT ने अपने पूर्व आदेश में स्पष्ट कहा  है कि जितनी भी जंगल  भूमि को डायवर्ट किया जाता है, उसके दुगने वन क्षेत्र पर कंपनसेटरी फॉरेस्टेशन किया जाये . लेकिन छतरपुर कलेक्टर ने इस बात की भी अनदेखी  कर दी. डॉ. नाजपांडे ने बताया  कि हीरा खदान से वहां रहने वाले करीब 8000 लोगों  पर इसका असर पड़ेगा. इनके लिए सरकार ने किसी तरह की योजना  नहीं बनाई है. . बड़ी बात यह भी है कि खदान के बनने से वन भूमि के जल स्त्रोतों को बड़ा नुकसान भी पहुंचेगा. तमाम दलीलों को याचिकाकर्ता ने अपने जनहित याचिका में प्रदर्शित किया है

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